Wednesday, September 17, 2014

रैनबसेरा

तेरा प्यार  एक रैन बसेरा ही तो है
जिसकी कसक खीच लाती है मुझे तेरे पास
और मैं बिन डोर खिची चली आती हु कुछ बल बिताने
तेरी बाँहों के उस रैनबसेरे में जो मुझे
पता है मेरा नहीं
पर फिर भी जो सुकून उन कुछ पलों में मिलता है
वो कहीं और कहाँ वो तो कहीं भी नहीं है
जिन्दगी के हसीं पल हैं गुजरते हैं तेरे साथ मेरे
जबकि मुझको भी ये पता है ये सब छण भंगुर है
पर फिर भी मुझे उन लम्हों को जीने की तलब है
और ये तलब तब तक रहेगी जब के मुझमे जान है
है तो तेरा प्यार रैनबसेरा पर इसमें ही मेरा जीवन है
और मैं कल्पना मात्र से पुलकित हो जाती हूँ
जब भी वहां रुकने की बात होती है
बस खुद से ये ही इल्तजा मेरी
कि इसका साया यूँ ही बना रहे।
राखी शर्मा

Tuesday, September 16, 2014

एक अजनबी

एक अजनबी से मेरी यूँही मुलाकात हो गयी
जिन्दगी के सफ़र में मैं उसके साथ हो गयी
मेरा हर दुःख मे मेरे हर सुख में शामिल है वो
मेरे हर  दिल के बाग़ का माली है वो
वो जबसे मिला है खुद को भूल गयी हूँ
उसकी सुरमई आँखों में डूब गयी हूँ मैं
वो हर लम्हा मेरे साथ साए की तरह रहता है
तुम्हे छोड़कर नहीं जाऊंगा हर पल मुझसे ये कहता है
ये बंधन उससे न जाने मेरा कैसा है
जो किसी को समझ न आये शायद ऐसा है
वो अजनबी दोस्त जब से मिला है जिंदगी खिल गयी
मेरे खवाबों को उसके अहसासों के पंखों से उड़ान मिल गयी
जाने कैसा रिश्ता जुड़ गया है उससे मेरा
पल की खबर उसकी रखने को बेचैन रहता मन मेरा
न जाने ये कैसे अहसास मुझे में जागने लगे हैं
मुझे हर घडी उसी के ख्याल अब सताने लगे है
अजनबी होकर भी वो मुझे अपना सा लगता है
उससे  रूबरू मिलना ही अब मेरे जीवन का सपना है
राखी शर्मा

Friday, September 12, 2014

अफसाना तेरा मेरा

अफसाना मेरी जिन्दगी का बस इतना सा है
तुझसे मिलना मुझसे बस एक सपना सा है
कुछ लम्हे साथ जो बिताये हमने वो कैद है यादों में
जी थी जिन्दगी मैंने जो वो तेरे साथ जस्बातों में
वो रास्ते का सफ़र जब मैं तुम्हारे साथ थी
चली जब दोनों के दिलों में वो प्यार की बयार थी
नैनो ने नैनो की मौन भाषा बिन कहे ही समझ ली थी
कुछ इज़हार और इकरार की बातें हम दोनों ने जो की थी
बेपर्दा इश्क बिना कहे ही आँखों से ब्यान हो गया
मोहब्बत का अफसाना वो उस सफ़र में जवान हो गया
नर्म हाथों का स्पर्श मेरे हाथों पर आज भी वैसा ही है
इतने दिनों बाद भी प्यार का खुमार वैसा ही है
तू तो एक हवा का झोका था जो तूफ़ान बन के आया
मेरी रूह को तूने अपनी रिमझिम प्यार की बारिश से भिगाया
वो फ़साना प्यार का दिल में जिन्दा रहेगा मरते दम तक
जब भी तनहा होती हूँ मैं आवाज तेरी ही सुनती हु दूर तलक
पता है मुझे वो पलछिन अब लौट के फिर न आयेंगे
मेरे नैन शायद तुम्हे कभी देख न पाएंगे
अफसाना ये तेरी मेरी मोहब्बत का किसको सुनाऊ
कैसे मैं अपने इस दुखी दिल को तेरे बिना राहत दिलाऊं
काश के किस्मत वो लम्हे एक बार फिर ले आये
के तू फिर ऐसी ही किसी सफ़र में मुझसे रूबरू हो जाये
राखी शर्मा

Wednesday, September 10, 2014

फिर कब मुझसे बात करोगे

पहली नजर में तुम्हे पहचान गयी मैं
अचानक तुम्हे देखा तो सहम गयी मैं
जिन्दगी से तुम्हे खो दिया था मैंने
तुम वापस आये तो तुम में खो गयी मैं
मेरी दुनिया फिर कब आबाद करोगे
फिर कब मुझसे बात करोगे

जिस दहलीज़ पर तुमसे मिली थी
प्यार की कलियाँ जहाँ फूल बनी थी
आज भी वो आँगन तुम्हे बुलाता है
जहाँ हमने अपने प्यार की कहानी लिखी थी
क्या मेरे साथ फिर से वहां चलोगे
फिर कब मुझसे बात करोगे

याद है मुझे वो तुम्हारी आखिरी मुलाकात
था तुम्हारे हाथों में मेरा कोमल हाथ
आँखों में तुम्हारी आंसुओं की झड़ी थी
बहुत दिर तक रहे हम दोनों साथ साथ
क्या आज भी मेरा हाथ थाम के चलोगे
फिर कब मुझसे बात करोगे

पर ये क्या तुम तो मुह मोडकर चले गए
मेरी आँखों के आंसू यूँही छोड़कर चले गए
कैसी हो तुम अब  भी गूंज रहा है कानो में
मूक करके मुझको फिर छोड़ क्र चले गए
फिर कब मुझसे मुलाकात करोगे
फिर कब मुझसे बात करोगे

आँख खुली मेरी और मैं सन्न रह गयी
एक अश्रुधारा मेरी आँखों से बह गयी
भूल गयी थी मैं की तुम मर चुके हो
तुम्हारी सूरत मेरे जहन में फिर घूम गयी
फिर कब मेरे सपने में आकर मुझसे  आत्मसात करोगे
फिर कब मुझसे बात करोगे
फिर कब मुझसे बात करोगे..................
राखी शर्मा

Tuesday, September 9, 2014

मेरा मन एक बच्चा

मेरे अंदर का बच्चा काफी कुछ सह जाता है
सहमा सहमा डरा डरा जुबान से कुछ नही कह पाता है
कहीं उदास है टूटे सपनो से तो कही  आशा अधूरी है
जो उसको बेबस करती वो आज भी उसकी मज़बूरी है
चाहता तो है वो भी उड़ना अरमानो के पंख लगा के
करता रहता है बार बार कोशिश अपने पंख फडफडा के
गुमसुम  सा मूक सा रहता है वो मुझसे बस ये कहता है
क्यों मुझे आज़ादी नहीं क्यों ये जुल्म ज़माने के सहता है
बच्चा है आखिर जिद पकड़ के बैठ ही जाता है
और उसे समझाने को फिर मेरा दिमाग जोर लगाता है
राखी शर्मा

Monday, September 8, 2014

जिन्दगी फिर भी खूबसूरत है

जिन्दगी मेरी खूबसूरत न सही पर बदसूरत भी नहीं
रहती हूँ मैं बदहवास सी पर फिर भी मुझे कोई दुःख नहीं
रोज सुबह से जो यात्रा शुरू होती है तेरी यादों के साथ मेरी
लगती है मुझे अकेले ये कुचे ये गलियाँ दिन में भी अँधेरी
फिर भी जिन्दगी को खूबसूरत बनाने की कोशिश करती हूँ
और हर रात मैं उधेड़बुन में तेरे साथ बिताये पलों से गुजरती हूँ
अकेले क्यों फिर भी जी रही हूँ मैं ये समझ नहीं आता है
फिर लगता है कि जिन्दगी तो मेरी खूबसूरत ह मुझे जीना नहीं आता है
पहाड़ों पे अकेले मैंने कई घंटे बैठ कर देखा है
और ख़ूबसूरती क्या होती है ये मौन रहकर ब्यान करना सिखा है
बहती नदियों की कल कल मुझसे ये कहती है
अकेली तो मैं भी हूँ पर फिर भी जीवन पथ पे निरंतर बहती हूँ
ये वोही कुचे और गलियाँ हैं जो मुझे अहसास दिलाते है 
कि जिन्दगी खूबसूरत है और हम भी उस पे यूँही बढ़ते जाते हैं
ये ठूंट खड़े पेड मुझ तक ये पैगाम पहुंचाते हैं
की कैसे अपनी इच्छाओं में दृड रहना है ये सिखाते हैं
अब तो बस जिन्दगी की खूबसूरती को निहारना मेरा काम है
और खुल के जीना है मुझे और मौत ही मेरा आखिरी आयाम है ।
राखी शर्मा

Sunday, September 7, 2014

भूख और रोटी

भूख और रोटी
कितना गहरा नाता है न इनमे
लगता है जैसे दोनों एक दुसरे की पूरक हो
कैसे आखिर इनके महत्व को नाकारा जाए
जब भूख लगती है रोटी की तो बस आदमी कितना बेबस हो जाता है
भूख ही तो है तो आदमी को कभी हैवान तो कभी शैतान  बना देती है
मैं पूछती हूँ क्या भूख केवल रोटी की है
नहीं भूख पैसे की भूख शोहरत की
भूख हवस की और भूख है अरमानो की
क्या इनसब की भूख केवल रोटी मिटा सकती है?
नहीं पर सबसे बड़ी भूख वो है जो पित में लगती है
जिसको सिर्फ और सिर्फ रोटी मिटा सकती है
और ये जो बाकि भूख हैं इनको तो खुद भगवान् भी नहीं मिटा सकता
क्युकी भूख एक बार जब लगती है तो फिर हर बार लगती है
चाहे वो भूख रोटी की हो या किसी और की
ये भूख ही है जो इंसान की फितरत को पल में बदल देती है
गौर कीजियेगा कि क्या मैं गलत कह रही हूँ...........?
राखी