Wednesday, July 1, 2015

पहरे क्यों

आखिर किसने पहरे लगा दिए है तुम पर जो याद भी नही करते 
इन बारिशों के मौसम में भी तुम भीगने की फ़रियाद नही करते
क्यों इस कदर बेरुखी का आलम हो गया है मेरी ही तरफ तुम्हारा
आखिर अब मुझसे वो पहले वाली प्यार की गुफ्तगू नही करते
पता है उलझनों में तो हो तुम पर मेरी जुल्फों को अब संवारा नही करते
वो पहले सी बात नही रही क्योंकि बरबस ही तुम मुझे निहारा नही करते
आँखों में वो पहले सी कशिश कहीं नही है अब मुझे तुम जान कह के पुकारा नही करते
कजरारी आँखों को दरिया बताना अब दरियाओं में डूबना गंवारा नही करते
पहले सा कुछ नही रहा अब और तुम ऐसे तो नीरस जिंदगी गुज़ारा नही करते
प्यार खत्म हो गया है हमारे बीच फिर भी तुम मेरे जीवन से किनारा नही करते
बड़ी ही तकलीफ देह है तेरी ख़ामोशी जा हम भी तेरे जैसे संगदिल के लिए जीवन बेज़ार नही करते
हम भी कहते है आज सबको की हम तुझसे भी प्यार नही करते प्यार नही करते............
राखी शर्मा

सिलसिले

खत्म कर दिए हैं मैंने मोहब्बत के सभी सिलसिले तुझसे
तेरी ज़ात से मुझे मुक्म्मल नफरत सी हो गयी है
कैसा तेरा किरदार जो मोहब्बत भी न सम्हाली मेरी
और किसी और चेहरे पे तू निसार हो गया है
कैसे तुझसे वफायें निभाऊं इतनी हिम्मत कहाँ से लाऊँ
मुश्किल बड़ा अब ये इम्तिहान हो गया है
मेरी ही गलतियां है जो तुझसे इश्क़ की डोर बांधी मैंने
कैसे ये गलतियों का अम्बार हो गया है
ख़त्म कैसे करू बता अब ये मोहब्बत अपनी रूह से मैं
के तुझसे रूहानी प्यार हो गया  है।
राखी शर्मा

तुम्हारी आँखे

दिलकश हैं तुम्हारी आँखे बहुत जब भीं देखा इनमे डूब ही गया
कुछ तो रहम खाओ इस दीवाने पे मेरा तो सब कुछ तुमने लूट ही लिया
आँखों से मचाकर कत्लेआम पूछती हो मुझसे क्या खता हो गयी
दिल में इस कदर उतर गयी की लगता है जिंदगी तुम बिन सजा हो गयी
काजल जो लगाया तुमने चिलमन और ज्यादा सुर्ख और रंगीन हो गयी
तुम्हारी आँखे तो मेरे लिए जन्नत सी हसीन और तुम मेरे लिए हूर हो गयी
मेरी इल्तज़ा सुनती जाना ओ हसीना के तुम्हारी आँखे दिल में बस गयी हैं

वो बेवफा

मेरी बात सुनते ही गज़ब की ख़ामोशी छा गई उनमे
मैंने तो बस ये पुछा कि किसी से वफ़ा की है क्या कभी??????
बहुत देर के बाद सोच के बोले कभी किसी से इतनी मोहब्बत ही नही की मैंने
तुम तो वफ़ा की बात करती हो मुझे तो ये तक याद नही की मोहब्बत कब की
सुनकर उनकी ये बातें मेरी आँखों में आंसू बाह निकले और मैंने कहा
जो मैंने तुमसे मोहब्बत की उसका क्या मैं तो खुद गुनहगार बन गयी
तुमसे ये सवाल करके अपनी नज़रों में ही खुद को ही गिरा लिया
वो फिर बोले मोहब्बत होती तुम्हे तो ये सवाल ही क्यों करती तुम
कुछ सवालों के जवाब मेरी आँखों में ढूँढो तो खुद ही मिल जाएंगे
कैसी मोहब्बत है ये जो इलज़ाम दिलबर पे सरेआम लगाती है
और फिर मुझे दोषी बता के अपनी आँख से आंसू गिराती हो
दिल में झांक के देखो तो तुम्हे पता चले की कौन गुनाहगार है
मैं तो बेबस सी बस उसे देखती ही रह गयी और ये ही कहा कि मेरे दिल की गहराई तू क्या जान पायेगा जो मुझे प्यार ही न करे
जिस आग में जली हूँ मैं अब तक तुझे तो उसकी आंच भी नही लगी
जा आज़ाद है तू मेरे हर सवाल से हर इलज़ाम से और बेवफा के दाग से

राखी शर्मा

तुझसे मोहब्बत

है।
वो तेरे गुलाबी होंठ मोहब्बत मुझे उनमें बसने वाले रास से है
तेरी सूरत से मोहब्बत नही उस पर आने वाली दमक से है
वो तेरी सुराईदार गर्दन मोहब्बत उसमे पड़े तेरे हार से है
तेरे कानो में पड़ी बालियां मोहब्बत उनकी झंकार से है
तेरे हाथों पड़ी चूड़ियाँ मोहब्बत उनकी खनखनाहट से है
वो टी पायल है तेरे पैरों की मोहब्बत उनकी छमछामाहट से है
जब तू चलती गई बलखा के तो मोहब्बत तेरी चाल से है
दीवाना बना दिया है कसम से मोहब्बत तुझ बेमिसाल से है
न मुझे तेरे किरदार ऐ कुछ मतलब है नई तेरी ज़ात से ओ हसीना
मोहब्बत तुझसे जुडी हर छोटी बड़ी आम और ख़ास बात से है ।
मुझे मोहब्बत तेरे दिल से और तेरी आत्मा में बसने वाले हर जस्बात से है
राखी शर्मा

Friday, June 12, 2015

काश

काश के किस्मत लिखना मेरे बस में होता तो
मैं अपने हाथ से तेरे नाम की लकीर मिटा देती
काश के समझ पता तू मेरे जज़्बातों को कभी
कसम से मैं तुझ पे अपनी जान तक लूटा देती
अगर गुनाह सिर्फ मेरा होता ये मोहब्बत तो
बस मैं अपने आप को ही इसकी सजा देती
खुद को तनहा छोड़ना मेरे बस में नही अब
मैं कैसे तेरी मोहब्बत को दिल से भुला देती
तुझे शौक है तो बन जा बेवफा ओ मेरे हबीब
मैं कैसे खुद को दुनिया से बेवफा कहलवा देती
नुमाइश नहीं होती रूहानी प्यार की हमदम
फिर कैसे ये राज़ मैं दुनिया को बता देती
जो नम कर गया है दर्द से तू मेरी आँखे
कैसे इसके आंसुओं को मैं इन आँखों में छुपा लेती
फितरत है मेरी किस्मत की शायद दगा देना मुझे
पर मैं कैसे अपना दिल तोड़ के खुद को हँसा लेती
गम न कर तुझसे बहुत दूर चली जाउंगी मैं ये हमनवा
जाना ही था दूर तुझसे तो क्यों तुझे अपना पता देती
खुदा हाफिज है मेरी जान तुझे  तू रहे अमन चैन से
मैं कैसे तेरे पास रह्कर अपने ज़ख्मो पे नमक लगा लेती ।
राखी शर्मा

Monday, June 1, 2015

जिन्दा है क्या मोहब्बत

तेरे ख़तों जो आज भी पढ़कर लगता है की जिन्दा है तेरी मोहब्बत कहीं
आँखों में मेरी पसरी ख़ामोशी को पढ़ कभी तू बसी है तस्वीर इनमे कहीं
लबों का रंग आज भी गुलाबी है मेरा बस्ते हैं इनमे तेरव लबों के अहसास कहीं
दिल में झाँक कर देख मेरे कभी आज भी लगी है तेरी तस्वीर दीवारों पे कहीं
हाथों की मेहंदी बेरंग है मगर लगता है छुपा हुआ इसमें आज भी तेरा नाम कहीं
करती तो हूँ मैं कोशिश तेरी मोहब्बत को मिटाने की पर लिखी है रूह पे ये दास्ताँ कहीं
होती तो हूँ रूबरू मैं रोज़ हज़ारों से लेकिन तुझे देखने की चाहत बसी है मन में कही
कैसे बेवफा हो जाऊं खुद से मैं ऐ हमदम समाई है तेरी गुमनाम  मोहब्बत मुझमे कहीं ।
राखी शर्मा