Tuesday, February 21, 2023
Saturday, September 17, 2022
Saturday, September 10, 2022
Tuesday, September 3, 2019
Friday, June 28, 2019
दुखों का ज्वारभाटा है
ऐसे कैसे जीवन पूरा हो
खुशियों का सन्नाटा है
समाधि हुआ जीवन खुशहाल
हर तरफ नज़रों के भेदी बाण
कहाँ मिली है स्वतंत्र भूमि
कण कण मांगे बलिदान
रुदन क्रंदन आत्माओं का
जिव्हा करे न कोई मलाल
अंतिम सांस तक भटके प्राणी
करता नही ईश्वर कमाल
कचोटती है मन की पीड़ा हरपल
किस से जाकर करें सवाल
मूक बन बैठा हर कोई यहां
कैसे काटे माया जाल
मेरा अंतस भी घबराता है
ये कौन मुझे सताता है
अंदर है या बाहर कोई
व्यक्तित्व कौन लजाता है ।
मैंने पिया हर शब्द गरल
जीवन हुआ नही सरल
आशाएं फिर भी क्यों
फिरती मेरे मानस पटल
हुआ कैसा ये मुक्ति बोध
उसमें भी लगे कई अवरोध
कैसे मकड़जाल से निकले
प्रभु तेरा ये बालक अबोध
#राखी
Monday, May 27, 2019
Saturday, March 23, 2019
कैसी आज़ादी
कौन कहता है कि जब औरत के पास पैसा और नाम आ जाता है तो वो आज़ाद हो जाती है,जनाब आंखे खोल देखिए और दिमाग से सोचिये । कौन सी आज़ादी क्या उसे पता होता है क्या की असल आज़ादी है क्या ? मुंह खोलकर कुछ भी बोल देने से सच साबित नहीं होता वो लड़ रही हैं आज भी , अपने हक़ के लिए नही बल्कि समाज में खुद के सम्मान के लिए ।चाहे वो कितनी भी अमीर हो रुतबे वाली हो वो शरीर से बेशक आज़ाद हो पर मानसिक गुलामी से शायद कभी आज़ाद नहीं होगी क्योंकि उसके दिमाग को पंगु बना दिया गया है जन्म से ही । अपने आस पास नज़र घुमाएं आपको ऐसी अमीर मानसिक अपंग स्त्रियां दिख जाएंगी ।
#राखी
#एकख्यालयूँही
Sunday, February 24, 2019
Sunday, April 22, 2018
कैसी विडंबना
पता नही भारत की विडंबना कहूँ या हम सब के नसीब का दोष बलात्कार के विरोध में इतना हिंदू मुस्लिम हो गया कि सब असल मुद्दे को भूलकर मज़हब को लेकर ज्यादा आक्रोशित हो गए ।हिन्दू मुस्लिम को गालियां दी रहे हैं और मुस्लिम हिन्दू को ।एक बात मेरी समझ से परे है कि बलात्कार को भी धार्मिक बना दिया गया है । दोषी कौन है है असल में।
सिस्टम को दोष दे रहे हैं सरकार को भला बुरा कहकर अपनी भड़ास निकाल रहे है । पर अपनी मानसिकता को क्यों नहीं कुरेद रहे हम । उसके अंदर का जो गंद है उसको क्यों नहीं साफ करते । न तो किसी के मां बाप ने परिवार ने ही कोई धर्म किसी को ये संस्कार देता है कि आप बलात्कार करो ।हम जिस समाज में रहते हैं क्या वो हमें ये कहता है कि बच्चों का यौन शोषण करो ।मेरे ख़याल से ऐसा कतई नही है । फिर क्यों हम मज़हब और जात पात के और समाज का रोना रोते है जबकि गन्दगी तो हमारे अपने दिमाग में है ।
हम ख़ुद क्यों नही समझते का कहूँ समझना नही चाहते कि हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है । धर्म कोई भी हो अगर वो आपको एक अच्छा इंसान न बना सके इंसानियत न सीखा सके तो लानत है ऐसे धर्म पर फिर वो धर्म नही बस एक पागलपन है ।
हम बलात्कार के लिए सरकार से जवाब मांग रहे पेर क्या हमने कभी उनसे महंगाई के लिए जवाब मांगा ।?
क्या रोज़गार के अवसर बढ़ाने के लिए हम कभी धरने पर बैठे ?
क्या शिक्षा सुधार के लिये हमने कोई पत्र सरकार को लिखा ?
कितने लोग यातायात में सुधार के लिए सरकार को सवाल पूछते नज़र आये ।
किसने सवाल उठाया कि शहरीकरण के चलते हम तनावपूर्ण वातावरण में क्यों जियें?
और भी न जाने कितने अनछुए पहलू हैं जिनसे हम ये कहकर मुंह फेर लेते कि इनकी चिंता हम क्यों करें ये सरकार का काम है।
क्यों सारे मज़हब एक होकर इन सारे सवालों के जवाब नही ढूंढते ।आखिर कब तक मज़हब के नाम पर हम सब का शोषण करेंगे ये राजनीतिज्ञ ।
ज़रा सोचिए !!!!!
#बातबेबाक
Thursday, July 20, 2017
बात बेबाक
औरत जब भी प्यार में होती है वो अपने साथी को खाना बना के खिलाती है । ऐसे ही ही रहती है जैसा वो चाहता है ।अपना अस्तित्व ही खो देती है । खुद को खोना ही शायद इश्क़ है पर आदमी इश्क़ में भी अपना पौरुष दिखाना चाहता है ।हो सकता है वो उसका प्यार जताने का तरीका हो । वो पुरुषत्व को खुद पे इतना हावी रखता है की उसका वजूद खो जाता है उसके इस पौरुष की वजह से । वो इश्क़ तो करता है पर कहीं न कहीं वो पाना चाहता है उस देह को जो एक दिन मिट्टी हो जानी है।वो समेट लेना चाहता है अपनी चाहतों को वहीं तक । सब एक जैसे कभी नही हुए न हो सकते हैं । पुरुष में संवेदनाएं तो होती है पर उन्हें न जाने क्यों दबा लेता है कहीं अंदर ।परत दर परत जम जाती है पर वह कही कहता नही क्योंकि शायद उसका पुरुष होना ही उसके लिए एक अभिशाप है । उसे शायद ये डर रहता कि औरत उसे सझ भी पाएगी की नही और उसका ये डर उसकी कमजोरी को साबित करता है ।
#राखी
#बातबेबाक
Thursday, June 30, 2016
गीता
गीता आत्मा की शुद्घि है और जिंदगी का सार है । गीत एक ऐसी सोच है जिसे हर कोई समझ नही सकता न ही ये इतनी जल्दी समझ आती है पर जब ये समझ आने लगती है तो जिंदगी की कड़वी सचाइयों से रूबरू कराती है इसमें न कोई ढोंग है न ही कोई प्रपंच । इसे पढ़कर दुनियादारी की समझ बढ़ जाती है और मौत और जिंदगी के बीच का फासला समझ आता है । गीता वैसे तो हिंदुत्व का आइना है पर ज्ञान के वो चक्षु है जो ईश्वर की उस रौशनी तक ले जाते है जहाँ नर और नारायण में कोई फ़र्क़ नही रह जाता ।
गीता न तो कोई धारणा न ही कोई किताब बल्कि एक इंकलाब है आत्मा और परमात्मा को बीच के अंतर की समझ को बढ़ाता है ।अगर हम चाहते हैं हमारे कर्म और उनसे होने वाली ग्लानि से हम बचें रहे तो गीता को हमे अंगीकार करना ही होगा । गीता एक औसत विचार है जो मनुष्य की सोच से परे उसके कर्मों और उनसे होने वाली ग्लानियों का चिंतन द्वारा सही और गलत की समझ को मनुष्य को प्रदान करती है । गीता में दी गयी बातें बड़ी गुढ़ हैं जिनको समझ पाना सबके बस की नही पर जो एक बार समझ गया फिर उसको दुनिया की फिकर भी नही ।
बस एक बार उस ग्रन्थ को पढ़े अवश्य ।चाहे हिन्दू हो या और किसी भी धर्म को मानने वाले एक बार गीता को पढ़ें। आपको खुद ही लगेगा कि सच में आप अब तक कुछ सच्ची बातों से अनजान थे ।
कृष्ण की कही बातों का बस थोडा सा समावेश अपने जीवन में करके तो देखे शायद आपका जीवन बदल जाए ।
गीता की धर्म को नही दर्शाती अपितु सारी मानवजाति और इंसानियत को सुमार्ग पर ले जाने हेतु उत्तम तथ्यों को दर्शाती है ।
#राखी
Saturday, April 2, 2016
लड़की हूँ न
जब मै अपनी माँ की कोख में थी
तब से ही सोचती थी जब दादी कहती
की उसे तो पोता ही चाहिए पोती नहीं
जब मै पैदा हुई तो कोई ख़ुशी नहीं हुयी
सबके मुह लटके हुए और उदास थे
बचपन से ही मुझे त्याग और सहनशीलता
पाठ पढाया गया और झोक दिया इस
संसार की जरुरत पूरी करने में चूले में
मुझे स्कूल कभी जाने न दिया गया और
घर को ही मेरा संसार बना दिया गया
जब रखा मैंने जवानी की दहलीज़ पे कदम
ब्याह दी गयी मैं और मुझे भेज दिया गया
ससुराल एक ऐसी अनजान जगह जहाँ मेरा
कोई अपना नहीं सब पराये थे और मुझे तो पता ही न था कुछ भी बड़ी असमंजस में थी
जब डोली में बैठा जे विदा किया बाबा माँ ने
तो बस ये ही कहा अबी तेरे पति का घर ही तेरा घर
वहां जेक कभी किसी को जवाब नहीं देना आब्की सेवा करना और मै तो एक तक निहारती रह गयी
की आखिर मेरा घर है कहाँ मायका या ससुराल
अभी मुझे अपने सवाल का जवाब मिला भी नहीं था की आ गयी ससुराल और आते ही यहाँ मुझे मिली सास ननद जेठानी देवर और ससुर का दुलार
नयो दुल्हन का अहसास भी कितना सुंदर होता है
वो जानता है जो दुल्हन बनता है और कोई नहीं
फिर वो पल भी आया जब रूबरू हुयी मैं अपने पति से
पर ये क्या टूट गया मेरा दिल उसी रात क्युकी मई तो सिर्फ एक कटपुतली थी उसके लिए और कुछ नहीं
मन में सवालों के कई सैलाब आये और चले गए
पैर उफ्फ्फ तक न करी मैंने औरत जो थी
कुछ साल बाद वो आया जिसके आते ही खिल गया मेरा मअत्रीतव और वो लाया जीवन में बहार
आँचल में खेला मैंने लुटाया उसपे दुलार
आँखों जा तारा वो दिल का दुलारा वो मेरा
पयर सा बेटा मेरा सब कुछ वो और कोई नहीं
पहले एक था फिर मैं चार बेटो की माँ बनी
बस एक बेटी की आस थी वो ही नहीं मिली
सबकी जरूरतों को पूरा किया सबकी ताड़ना झेली
उफ़ नहीं की मैंने कभी औरत थी सहनशीलता मेरा गहना था येही सिखा था मैंने जनम से
अब मैं बूढी हो चली थी अब झेल रहो हूँ एक बेटे से दुसरे बेटे के घर दुसरे से तीसरे के घर
और अब तो वृद्धा आश्रम में रहने लगी हूँ सबसे तंग आकर और येही सोचती हूँ की इश्वर अपने पास बुला ले अब और सहा नहीं जाता
उपर जा कर पुछूनगी भगवान् से तूने मुझे औरत ही क्यों बनाया
मर गयी मई जब गयी भगवान् के पास और बोली क्यों दी मुझे ऐसी जिन्दगी जो नरक से भी बध्तर थी
क्यों में धरती पे औरत की ऐसी हालत की
भगवान् हस के बोले सुन तू अबला नहीं तूने अपने को अबला बनाया क्यों सहे जुल्म विरोध क्यों नहीं जताया
कलयुग में तू अपने हक की क्या उम्मीद रखती है
ये तो वो चीज़ है जो छीनने से मिलती है
उठ उठा ले हथियार कर ले आगाज़ और
जा इस समाज को ललकार
फिर देख कैसे तेरी बात मानी जाएगी
और तू भी दुर्गा और काली की तरह पूजी जाएगी
#राखी
Tuesday, September 22, 2015
एक पैगाम तेरे नाम
मेरा पैगाम तो तुझ तक पहुंचा होगा
जब ख़त तूने मेरा खोला होगा
आँखों से आंसू तो छलके होंगे
जब आखिरी सलाम मेरा पढ़ा होगा
छोड़ दिया मैंने इंतज़ार करना अब
तुझे अब ये समझ आ गया होगा
रूह में उतर गया था जो इश्क़ तेरा
उसे कतरा कतरा अब ढलना होगा
मैं तो छोड़ चली हूँ राहे जिंदगी में तुझे
अब अकेले ही ये सफ़र तय करना होगा
याद तो आउंगी मैं तुझे हमेशा ही याद रख
पर तेरे आंसुओं के सैलाब को रुकना होगा
पत्थर दिल को तेरे मोम न बना सकी मैं कभी
पर अब पल पल उसे जल के पिघलना होगा
रूह तेरी पुकारेगी मुझे पर मैं सुन न सकुंगी
तेरी आवाज़ को अपना रुख बदलना होगा
तूने जो गिराई हैं बिजलियाँ मुझ पे जरा गौर करना
उनकी तपिश में अब तुझको जलना होगा
मोहब्बत कभी न मिटी है न मिट पायेगी कभी
तुझे मगर मुरझाकर भी खिलना होगा
गुरूर तो टूटेगा एक दिन तेरा ओ साकी
क्योंकि आदमी है तूझे मिटटी में मिलना होगा
उस दिन मेरा ये ख़त पढ़ना निकल कर तू
जब तुझे जिंदगी छोड़ मौत की राह पे चलना होगा
मेरे ख्याल तुझे जीने भी नही देंगे तड़पेगा तू मौत को
जिस अज़ाब से मैं गुजर रही हूँ तुझे भी गुज़रना होगा ।
#राखीशर्मा








