Saturday, April 12, 2014

कैसी बेरुखी

उन्हें तो न तब फर्क पड़ता था न अब पड़ता है
मोहब्बत और नफरत दोनों बराबर है उनके लिए
बेजार तो हम हुए है ज़र्रा ज़र्रा बिखरे है
मोहब्बत में भी और नफरत में भी
सुर्ख आँखों में आंसू लिए दर दर घूमती हूँ
कोई आके तो देखे मैं किस कदर तुझे ढूँढती हूँ
प्यार में मेरी यादें भी नीलाम हो गयी हैं
और मैं लोगों से अब भी तेरा पता पूछती हूँ

मुझे एक ख़ुशी का टुकड़ा उधार दे दो
थोड़ी देर के लिए यार का दीदार दे दो
सारी उम्र इसके लिए चाहे सजा दे दो।
और अगर कम लगे तो फांसी दे दो
राखी

Thursday, March 13, 2014

तू बस तू

सुकून तो तब मिले रूह को मेरी
जब वो इस जिस्म से आज़ाद हो
पर नामाकूल ये जो तेरा प्यार है न
मुझे ऐसा करने नहीं देता है
मेरी पाक मोहब्बत तेरी यादो के साए में चलती है
आँखों से मेरे बारिश इस कदर बरसती है
कुछ तो है तेरे मेरे दरमियान आज भी हम दम
जो दूर होकर भी मेरी आखे तेरे दीदार को तरसती हैं।

Friday, March 7, 2014

औरत

जब मै अपनी माँ की कोख में थी
तब से ही सोचती थी जब दादी कहती
की उसे तो पोता ही चाहिए पोती नहीं
जब मै पैदा हुई तो कोई ख़ुशी नहीं हुयी
सबके मुह लटके हुए और उदास थे

बचपन से ही मुझे त्याग और सहनशीलता
पाठ पढाया गया और झोक दिया इस
संसार की जरुरत पूरी करने में चूले में
मुझे स्कूल कभी जाने न दिया गया और
घर को ही मेरा संसार बना दिया गया

जब रखा मैंने जवानी की दहलीज़ पे कदम
ब्याह दी गयी मैं और मुझे भेज दिया गया
ससुराल एक ऐसी अनजान जगह जहाँ मेरा
कोई अपना नहीं सब पराये थे और मुझे तो पता ही न था कुछ भी बड़ी असमंजस में थी

जब डोली में बैठा जे विदा किया बाबा माँ ने
तो बस ये ही कहा अबी तेरे पति का घर ही तेरा घर
वहां जेक कभी किसी को जवाब नहीं देना आब्की सेवा करना और मै तो एक तक निहारती रह गयी
की आखिर मेरा घर है कहाँ मायका या ससुराल

अभी मुझे अपने सवाल का जवाब मिला भी नहीं था की आ गयी ससुराल और आते ही यहाँ मुझे मिली सास ननद जेठानी देवर और ससुर का दुलार
नयो दुल्हन का अहसास भी कितना सुंदर होता है
वो जानता है जो दुल्हन बनता है और कोई नहीं

फिर वो पल भी आया जब रूबरू हुयी मैं अपने पति से
पर ये क्या टूट गया मेरा दिल उसी रात क्युकी मई तो सिर्फ एक कटपुतली थी उसके लिए और कुछ नहीं
मन में सवालों के कई सैलाब आये और चले गए
पैर उफ्फ्फ तक न करी मैंने औरत जो थी

कुछ साल बाद वो आया जिसके आते ही खिल गया मेरा मअत्रीतव और वो लाया जीवन में बहार
आँचल में खेला मैंने लुटाया उसपे दुलार
आँखों जा तारा वो दिल का दुलारा वो मेरा
पयर सा बेटा मेरा सब कुछ वो और कोई नहीं

पहले एक था फिर मैं चार बेटो की माँ बनी
बस एक बेटी की आस थी वो ही नहीं मिली
सबकी जरूरतों को पूरा किया सबकी ताड़ना झेली
उफ़ नहीं की मैंने कभी औरत थी सहनशीलता मेरा गहना था येही सिखा था मैंने जनम से

अब मैं बूढी हो चली थी अब झेल रहो हूँ एक बेटे से दुसरे बेटे के घर दुसरे से तीसरे के घर
और अब तो वृद्धा आश्रम में रहने लगी हूँ सबसे तंग आकर और येही सोचती हूँ की इश्वर अपने पास बुला ले अब और सहा नहीं जाता

उपर जा कर पुछूनगी भगवान् से तूने मुझे औरत ही क्यों बनाया
मर गयी मई जब गयी भगवान् के पास और बोली क्यों दी मुझे ऐसी जिन्दगी जो नरक से भी बध्तर थी
क्यों में धरती पे औरत की ऐसी हालत की

भगवान् हस के बोले सुन तू अबला नहीं तूने अपने को अबला बनाया क्यों सहे जुल्म विरोध क्यों नहीं जताया
कलयुग में तू अपने हक की क्या उम्मीद रखती है
ये तो वो चीज़ है जो छीनने से मिलती है
उठ उठा ले हथियार कर ले आगाज़ और
जा इस समाज को ललकार
फिर देख कैसे तेरी बात मानी जाएगी
और तू भी दुर्गा और काली की तरह पूजी जाएगी
राखी शर्मा

Monday, March 3, 2014

होली

इस बार तुझसे ऐसी खेलूंगी होली पिया
अपने प्यार में तोहे में ऐसा रंगुंगी पिया
की उतर न पाए जो कभी लाली ऐसी
लगाउंगी तेरे सोने  से मुख पे पिया
मेरे गोर रंग पे गुलाल हरा लगाना तुम पिया
मेरी चुनरी को पानी से भीगना तुम पिया
अबके ऐसी होली खेले हम दोनों सराबोर
खड़ी हो देखे साडी दुनिया हमको पिया
भीगू मैं भिगो तुम हो जाये उपर से बरसात पिया
हमारा दिल हमारी धड़कन हो जाये बस एक पिया

Thursday, February 20, 2014

तुम्हारी होना चाहती हूँ

एक बार तेरे गले लग के रोना चाहती हूँ
तेरे इन कंधों को आंसुओं से भिगोना चाहती हूँ
जीने की  खवाइश नहीं है अब मुझे ऐ हमदम
तेरी ही बाँहों में बस अपना दम तोडना चाहती हूँ
अपन इस निश्छल प्रेम को जो तेरे लिए है
एक तुझ पर  बस उडेलना चाहती हू
नींद नहीं आती मुझे इस गम ऐ जिंदगी में
तेरी गोद में चैन से सोना चाहती हूँ
जैसे कोई बच्चा माँ को देख कर खुश होता हो
मैं तुम्हे देखके खुश होना चाहती हूँ
हवस से दूर वो पवित्र प्रेम मिले जहाँ मुझे
ऐसी दुनिया में तुम्हे मै खोजना चाहती हूँ
आत्मा का जुड़ाव हो जहाँ और शारीर दूर रहे
मै उस मुकाम को पाना चाहती  हूँ
चलो चलें यहाँ से दूर उस भावो की दुनिया में
तुम्हारा हाथ पकड़ के मैं वहां चलना चाहती हूँ
हो बस एक हमारी ही दुनिया वहां और कुछ नहीं
मैं कुछ इस तरह से तुम्हारी होना चाहती हूँ
राखी

मुझे तेरा साथ चाहिए

तू अगर मेरा हाथ भी छू लो तो जिंदगी संवर जाये
तुझसे इस से आगे कुछ  नहीं चाहिए मुझे
तू बस मेरे साथ चल इन जिन्दगी की राहों पे
तेरे प्यार की बरसात नहीं चाहिए मुझे
मेरे साथ ऐसा रिश्ता बना लो तुम जो कभी न टूटे
तेरा उमर भर का साथ चाहिए  मुझे
तुझसे मेरा रिश्ता रूहानी है बड़ा पवित्र है
दुनिया को दिखाऊ ऐसा नहीं चाहिए मुझे
तू बात करे न करे मुझे याद करे न करे
बस तेरे साथ होने का अहसास चाहिए मुझे
दूर होकर भी तू दूर नहीं मुझसे साथ है
तेरी हर नजर मुझ पे हो बस तेरा दीदार चाहिए मुझे

Thursday, February 13, 2014

तेरे प्यार का ज्वर

तेरे प्यार का ज्वर इस कदर हो गया है
के किसी दावा से मुझे आराम नहीं आता
तेरे स्पर्श से और भी तपन बढ़ जाती है मेरी
मेरे इस दिल को कहीं आराम नहीं आता
मेरे अधरों पर बस तेरे अधरों की प्यास है
कोई पैमाना मेरी अब प्यास नहीं बुझाता
आकर बाँहों में भर ले मुझे जो सुकून मिले
के ये समां फिर से लौटकर नहीं आता
रेत तपती है जैसे रेगिस्तान में ऐसे ही मई भी
क्यों तू आपने प्यार की बारिश को नहीं बरसाता
आकर देख ले मुझे तू तेरे प्यार के मारे हम
हमे तो मैखानो में जाना नहीं सुहाता
एक हुक सी उठती है तेरे प्यार मुझ में
तू आकर मेरे गले से लग क्यों नहीं जाता
कुछ इस तरह समां जा मुझमे के रूह को चैन मिले
के तनहा हमसे अब रहा नहीं जाता
राखी