Thursday, September 4, 2014

तुम मैं और मन

कैसे हैं तुम मैं और मन
न तुम बदले न मैं और न ही मन
तुम भी मिलने को तरसते हो
मैं भी और मन भी
तुम भी आदत से मजबूर मैं भी मन भी
तुम भी मुझे सोचते हो मैं तुम्हे और हमारे मन भी
मैं भी प्यार में हु तुम भी प्यार में और ये मन भी
मैं भी सपने संजोती हु तुम भी और ये मन भी
मैं भी जुदाई में कुम्ल्हाई हु तुम भी और ये मन भी
प्यार की तडपन में तुम भी जलते हो मैं भी ये मन भी
कतरा कतरा जिन्दगी तुम भी जीते हो मैं भी मन भी
अधूरे अधूरे से हैं तुम भी मैं भी मन भी
राखी शर्मा

Wednesday, September 3, 2014

अहसास तेरे प्यार का

अह्स्सास तेरे प्यार का बहुत निराला है माँ
जितना भी सोचू मैं पैर ये अलबेला रिश्ता है माँ
जनम दिया तूने मुझे और लाड प्यार से पाला है
जा बाक्षर जब भी मैं अकेली होती हूँ
तूने दामन थामा है
और अब जब मैं विदा हो गयी ससुराल में
अब भी आती है तेरी यादें मेरे जहाँ में
दूर रहकर भी तुझे रिश्ता टूटा नहीं है मेरा
तुझसे प्यार और दुलार छुटा नहीं है मेरा
अहसास तेरे प्यार का कभी कम नहीं होगा माँ
न मेरे जीते जी और न ही मेरे मरने के बाद।
राखी

Tuesday, September 2, 2014

जिन्दगी का सफ़र

ये जिन्दगी का सफ़र कट तो रहा है
पर तेरे बिना जीने का वो मजा नहीं है
सफर तो है ये मगर अब कैसे कहूँ
कि जाने क्यों तू मेरा इसमें हमसफ़र नहीं है

पर फिर भी तेरी बातें मुझे हौसला देती हैं
तेरी सदाएं मुझे दुनिया से लड़ने की ताकत देती है
क्या कहु ये जिन्दगी का सफ़र न कट्ता
क्युकी तेरी हर दुआ मेरी मुसीबतों को को दूर कर देती हैं

हमसफ़र न सही मेरा सच्चा दोस्त ही बन जा
तुझे तो पता नहीं फर्क पड़े या नहीं मेरा तस्सवुर ही बन जा
और न जाने जिन्दगी किसकी कितनी बड़ी है
कुछ नहीं मेरे दुखों को रोकने वाली ढाल ही बन जा

इस जिन्दगी के सफर में मेरी बस ये ही तमन्ना है.........
राखी शर्मा

Monday, September 1, 2014

राज की बातें

तेरी मेरी राज़ की बातें
कुछ मीठी कुछ तकरार की बातें
कैसी ये हैं प्यार की बातें
हो जाये कुछ मनुहार की बातें
खोल दूं ये राज़ जो कयामत हो जाये
कैसे कह दूं कहीं बगावत न हो जाये
मैं कहती हूँ ये राज़ खोल दो
राज़ के जितने भी गिरह है आज खोल दू।
राखी

Sunday, August 31, 2014

मैं और तुम

मैं और तुम जब साथ थे तो थे
हमारा बिछोह तो कब का हो चूका
और मैं और तुम अब अलग हैं
पर क्या भूल  गए तुम
हमारा साथ बिताया समय
वो एक  दुसरे से जुड़ाव
वो हमारा एक दुरे के लिए स्नेह
वो साथ खाना घूमना बातें करना
वो प्यार के सुनहरे पल
बिछड़ तो गए हैं हम पर क्या
दिल से जुदा हो पाए हम तुम

लम्हे जुदाई के

ये लम्हे जुदाई के मुझसे काटे नहीं कटते
ये मिलन के बादल जल्दी से आकर क्यों नहीं बरसते
बड़े ही नामुराद पल हैं ये मेरे लिए
तुम  मुझसे अपने आप को रूबरू क्यों नहीं करते
मुझे हर वक़्त तेरा हो खयाल लगा रहता है
हरे जहन में हर वक़्त तेरा ही तेरा ही नाम रहता है
मैं जाऊं कहीं भी मगर मुझे हर पल तेरा साया मुझे घेरे रहता है
लम्हे ये जुदाई के काटे से नहीं कटते है
तुमको देखने को मेरे नैन तरसते रहते है
मेरे इस चातक दिल को बस मेघ की चाहत है
अपने इस चातक को मैंने तुमने ढूंढते देखा है
राखी

बचपन की खुशबू

बचपन के दोस्तों की खुशबू अब भी बाक़ी है
उनके साथ वो मिट्टी में खेलने का अहसास तरोताज़ा है
एक दुसरे का हाथ पकड़ गलियों में घूमना
भाग कर हम सबका वो रेत पे कूदना
वो पहली बारिश में सबका भाग भाग के घूमना
वो गली के कुत्तों का घर बना के उनके साथ खेलना
वो कागज़ की नाव और हवैजहाज़ बनाना
वो हम सब छत पे जाके पतंग को उड़ाना
वो गलिओं में जाके बैट और बॉल खेलना
कहाँ गयी वो यादें कहाँ गए वो दिन
कहाँ खो गयी वो बचपन की खुशबू
राखी