तीन दिन बाद मनोज घर आया।उसके आने के बाद गोविन्द का घर आना बंद हो गया। फुलवा अब ये जान चुकी थी की उसकी जिन्दगी में अब गोविन्द को पाने की कोई उम्मीद नहीं बची है।फुलवा एक मेहनती लड़की जल्द ही उसने घर का सब काम संभाल लिया।घर के लोग उससे बड़े खुश थे। बहुत बड़ा परिवार था उसका अब। पर उसकी जिन्दगी का खालीपन वो कोई नहीं भर सकता था। क्या एक औरत सिर्फ हवस की भूखी होती है ?उसके अंदर जस्बात नहीं होते?अगर नहीं होते तो क्या मनोज के साथ वो खुश नहीं रहती।एक कहावत है जाके पैर न फटी बेवाई सो क्या जाने पीर पराई।ये सही भी है ।जब तक अपने उपर बितती है तभी ही पता चलता है। वो जी तो रही थी पर वो खुश नहीं थी। एकांत के वो लम्हे उसे भाते नहीं थे। डरने लगी थी वो और हमेशा उन लम्हों से खुद को बचने की कोशिश में रहती थी। मन की कुंठा किसी से कह भी तो नहीं सकती थी।
वहां उसकी महुआ की शादी एक अधेड़ के साथ तय करदी उसकी माँ ने।उसके दो बच्चे थे। ज़मींदार था वो और महुआ वो तो सब कुछ बिना बोले ही सहती जा रही थी। गरीबी देखि थी उसने शायद इस्सी वजह से उसका मुंह बंद था। फुलवा ने विराध भी भी किया पर महुआ ने उससे रोक दिया ।क्योंकि इसे पता था की उसकी शादी से उसके घर के लोगो का भी फायदा है। महुआ का विवाह हो गया और दो बच्चो की जिम्मेदारी संभाल ली उसने। पर शादी के बाद उसने कभी अपनी माँ और बहनों को काम पर जाने की नौबत नहीं आने दी। महुआ पर दो लडको की जिम्मेदारी थी दोनों उम्र में ग्यारह और तेरह साल के थे पर अमीर बाप के बिगडैल बच्चे थे ।महुआ को सब पता था कि वो सारा दिन यहाँ वहां घुमने के अलावा दुसरो को अरेशान करने के अलावा कुछ नहीं करते थे पर वो उनकी सौतेली माँ थी कहती भी तो क्या?उसने धीरे धीरे बच्चो से अपनापन बढाया। एक दिन वो घर में अकेली थी छोटा बेटा वहां खेल रहा था अच्चानक उसे चोट लगी उसने भागकर बच्चे को गोद में उठा लिया। और मरहम पट्टी की। छोटा उससे घुलमिल गया ।एक दिन छोटे ने बताया की उनकी माँ मरी नहीं थी उसे मार दिया गया था। महुआ ये सुन कर डर गयी ।वो सोचने लगी की आखिर क्यों उसके पति ने अपनी पत्नी को मार डाला।घर के नौकरों से भी पूछने की उसकी हिम्मत नहीं थी। पर वो समझ चुकी थी की कुछ तो जरुर है और वो पता लगा के रहेगी।
उधर फुलवा माँ बन चुकी थी ।उसने एक सुन्दर बच्चे को जनम दिया था ।बच्चे के आने से उसकी जिन्दगी का खालीपन भरने लगा था। मनोज भी खुश था।अनु और नीरा की भी जिन्दगी चल रही थी।अनु शादी नहीं करना चाहती थी ।वो शहर जाने के सपने देखा करती थी।उसने अपने ख्वाबो की दुनिया बसा ली थी और उसी में जीती चाहती थी।एक दिन अपने ख्वाबों को पूरा करने की चाह में वो देर रात घर से निकल गयी। सुबह उसने ट्रेन पकड़ी और जा पहुंची एक बड़े शहर में। मुंबई रेलवे स्टेशन पर उतरी तो उसने सोचा भी नहीं था उसकी जिन्दगी में अगला मोड़ कितनी जल्दी आने को है।वो स्टेशन से बाहर आई और शहर की चकाचौंध में खो गयी। चलते चलते वो थक गयी ।भूख भी लगी थी। उसने दस रूपए निकाले और वडा पाव्र लेकर खाने लगी। वो चली जा रही थी कि पीछे से कार से टकरा गयी और फिर उसे होश न रहा। आख खुली तो खुद को एक आलिशान घर में पाया।
Friday, August 30, 2013
हाय रे औरत तेरी किस्मत -भाग तीन
Monday, August 26, 2013
हाय रे औरत तेरी किस्मत -भाग दो
फुलवा की शादी का दिन था ।एक दुल्हन की तरह वो भी सजी धजी ।पैर उसकी आँखों में वो चमक न थी जो होनी चाहिए थी। आखिर उसके अरमान शादी के हवन कुंद में जलकर सुवाहा जो होने जा रहे थी ।घर में ख़ुशी का माहौल था। फुलवा के दिल में जो विराना था उसकी किसी को खबर नहीं थी।उसकी बहने सब जानती थी।महुआ सबकुछ जानती थी पर वो करती भी तो क्या। खैर शादी की सारी रस्मे हो चुकी थी। बस विदाई बाकी थी। और वो भी हो गयी। नीरा की आँख भर आई क्युकी फुलवा उसे हमेशा सबसे बचाती थी माँ को कभी मारने नहीं दिया उसने नीरा को। फुलवा के घर से जाते ही दिनचर्या पहले जैसे हो गयी। वहां फुलवा अपनी ससुराल पहुँच गयी थी। ससुराल जाते ही उसका मन और खिन्न हो गया। सब अजनबी थे। वो ये ही सोच रही थी कि क्या हो गया सब ।सारी औरते उसके पास बैठी थी।तभी एक आवाज़ सुनकर वो चौक पड़ी। उसकी खोयी मुस्कान वापस आ गयी। और आँखों में चमक उसके सामने गोविन्द खड़ा था ।पर घूँगट की आड़ में वो उसे देख नहीं पाया था।अब वो घडी आ पहुंची थी जब फुलवा और मनोज आमने सामने थे। मनोज बहुत ही सीधा साधा था पर फुलवा को चाहता बहुत था। पर फुलवा वो तो पता नहीं किस भूलभुलैया में घूम रही थी। मनोज जितना फुलवा के पास आने की कोशिश करता फुलवा उतना ही उससे दूर जाने की पर आखिर कब तक।मनोज उस पर जबरजस्ती नहीं करना चाहता था वो ये ही सोच रहा था की अभी वो दोनों अजनबी हैं पर एक मर्द कैसे अपने आप को संभालता और तब जब की जिसे वो सबसे ज्यादा चाहता हो वो उसके पास हो।उसने फुलवा को अपनी बाहों में भर लिया और फुलवा भी कब तक खुद को कैसे संभालती।फुलवा की आँखों में नींद का नाम नहीं था ।खुद को आईने में देख कर सोच रही थी की एक ही रात में उसकी जिन्दगी बदल गयी। पौ फट चुकी थी। फुलवा अपनी साडी समेटकर उठी और नहाने चली गयी। मनोज का घर ठीक ठाक था ।वहां बहुत बड़ा आँगन था ।आँगन में खुले बाल सुखा रही थी तभी कुछ आहट हुई वो भाग कर कमरे में चली गयी और मनोज से जा टकराई ।मनोज भी शायद तैयार नहीं था और दोनों धडाम से गिर पड़े और फुलवा का सर दीवार से जा टकराया और खून की धारा बह निकली। नयी नवेली दुल्हन का ये हाल देखकर मनोज डर गया ।भागकर उसने फुलवा को उठाया और अपनी माँ को आवाज दी और खुद डॉक्टर को बुलाने चल पड़ा।चोट गहरी थी बस सब लगे बहु की सेवा करने में ।पे फुलवा की आँखे को गोविन्द की एक झलक पाने को बरक़रार थी। मनोज काफी परेशान था। बस वो लग गया फुलवा की देख रेख में। फुलवा को अगले दिन अपने घर जाना था पगफेरी की रस्म के लिए।मनोज के साथ चल पड़ी वो घर ।उसकी बहाने उसके माथे पर पट्टी देखकर सहम गयी ।माँ का मन भी कई सवालो से घिर गया पर जब सब पता चला तो हसे बिना नहीं रह सके सब। उसकी माँ ने गोविन्द से उसे वहीँ छोड़ जाने की बात रखी ।गोविन्द तो कुछ कह ही नहीं पाए पे फुलवा ने ही रुकने से मन कर दिया। उसने महुआ को गोविन्द के बारे में बताया और उसका घर न रुकने का कारन भी।बस आ गयी वो मन में गोविन्द से मिलने की आस लिए।जब घर पहुंचे तो घर में ग़मगीन महौल था ।फूफा जी की तबियत काफी ख़राब थी और बुआ जी ने बुलवा भेज था की कोई आ जाये ।पर जाये कौन बाबूजी तो पहले ही बीमार थे। आखिर मनोज को ही जाना पड़ा। मनोज जाना नहीं चाहता था। क्युकी फुलवा को भी चोट लगी थी। उसने फुलवा से पुछा तो वो कुछ न बोली।खैर वो चला गया ।रात हो चली थी फुलवा को भी दर्द के मारे नींद नहीं आ रही थी। ठण्ड भी थी। वो उठी और शाल लेकर बाहर आई। बाहर चूले में आग थी उसने हाथों को सेकने के लिए अंगारे एक मिटटी के बर्तन में भरे और अन्दर जाने लगी तभी वो सन्न रह गयी सामने गोविन्द खड़ा था। उसके चेहरे पर हैरानी थी।लालटेन की हलकी रौशनी में भी वो फुलवा को पहचान गया और उसके मुह से बस ये ही निकला फुलवा तू। फुलवा जल्दी से कमरे में भागी पर गोविन्द भी उसके पीछे हो लिया। फुलवा के मन में तो जैसे सितार बजने लगे। इससे पहले वो कुछ कह पाती गोविन्द ने उसके माथे को छुआ और पुछा की ये सब कैसे। फुलवा की आँखों से अश्रुधरा बह निकली और वो भाग कर गोविन्द की बाहों में समां गयी।गोविन्द को कुछ समझ नहीं आया ।उसने फुला को खुद से अलग करना चाहा पर फुलवा वो तो खो ही गयी थी।
फुलवा ने सारी व्यथा गोविन्द से कह दी। रात गहरी हो चुकी थी गोविन्द मनोज का चचेरा भाई था। वो फुलवा से बोल की अब उसे जाना है ।फुलवा उसे जाने नहीं दे रही थी। गोविन्द उससे अगले दिन मिलना का वादा कर जाने लगा तो फुलवा ने उसे धक्का दे दिया वो पलंग पे गिर पड़ा और फुलवा उसके सीने पे सर रख कर लेट गयी। फुलवा को कब नींद आई उससे पता न चला। सुबह उसकी आँख खुली तो वो अकेली थी। उसे लगा जैसे उसने रात कोई सपना देखा हो। वो आज पहले से ठीक थी। उसने आज खुद को अच्छे से संवारा और श्रींगार किया ।उसे रात का इंतज़ार था।दिनभर तो वो औरतो से घिरी रहरी थी। शाम को गोविन्द डॉक्टर को लेकर आया ।वो पट्टी कर गया और दावा दे गया ।मनोज की माँ ने गोविन्द से कहा की वो अपनी भाभी का ध्यान रखे।अब तो वो ही हो गया जो फुलवा चाहती थी। गोविन्द और उसकी नन्द उसके पास रहे ।नन्द को भी नींद आ गयी वो भी सोने चली गयी। सन्नाटा चारो तरफ फ़ैल गया था।फुलवा गोविन्द के साथ के लिए तड़प रही थी ।वो जानती थी की अगर मनोज आ गया तो वो गोविन्द को करीब कभी नहीं जा सकेगी। कहीं पर गोविन्द के दिल में फुलवा को पाने की चाह थी ।आखिर कब तक दिल के समंदर की लहरों को रोक पाते दोनों ।आखि र दोनों एक दुसरे के हो ही गए। और वो रात फुलवा की जिन्दगी में कभी न भूलने वाली रात बन गयी।
क्रमशः
Sunday, August 25, 2013
हाय रे औरत तेरी किस्मत -कहानी भाग 1
नीरा वैसे तो एक आम लड़की थी पर उसकी कहानी कोई नहीं जानता। बिहार के सुदूर इलाके में जन्मी थी वो। घर में उसके अलावा तीन बड़ी बहनें और थी ।पिता तो उसके पैदा होने से पहले ही चल बसे थे। नीरा छोटी थी पर वक़्त की ठोकरों ने उसे बड़ा बना दिया था। जब से होश संभाला उसने फटे कपड़ो के अलावा कुछ नहीं मिला था तन ढकने को। पर फिर भी वो खुश थी अपनी जिंदगी में। उसकी माँ और बड़ी बहाने रोज खेतो में काम करने जाया करती थी। नीरा को भी अपने साथ ले जाती थी। वो पांच साल की अबोध बच्ची कुछ कर तो नहीं पाती थी पर फिर भी सबको पानी पिलाने की जिम्मेदारी उसी की थी। वो बच्चो के साथ मिटटी में खेल करती थी। गोरा रंग हिरनी सी आँखे और मासूम चेहरा उसकी खासियत थे। उसकी माँ अपनी सारा दिन जी तोड़ मेहनत करती थी । घर में चुल्हा जलने का एक येही जरिया था। उसकी सबसे बड़ी बहन तेरह साल की थी ।समय अपनी गति से चल रहा था ।बस रोज की वही भागदौड़ में जीवन का पता ही नहीं चलता था। नीरा अब दस साल की हो चली थी ।नीरा की माँ अब उसकी बहनों की शादी करना चाहती थी ।
पर गरीबी ने उसके हाथ बांध रखे थे।सावन आ गया था सब बहने मेला देखने जा रही थी ।गाँव की सारी लडकियां एक साथ मिलकर चल पड़ी दुसरे गाँव ।नीरा की बड़ी बहन फुलवा अनु महुआ भी नीरा का हाथ थामे चल रही थी। मेले की रोनक तो देखते ही बनती थी ।सब की आँखे चकाचौंध हो गयी। सारी खुश थी ।फुलवा के चेहरे पर हलकी सी मुस्कराहट थी।
वो किसी को देखकर शर्मा रही थी ।जाने कौन था वो नौजवान जो उसे एकटक देखे जा रहा था ।फुलवा भी उसे देखती और फिर नजरे झुक लेती। उसके मन की देहलीज पैर प्यार दस्तक दे चूका था और वो उस अनजाने अजनबी से आँखे चार कर बैठी थी। आने वाली जिन्दगी से बेखबर वो उस अजनबी के प्रेमपाश में बंधी जा रही थी ।शाम हो चली थी सब लडकियां गाँव कीतरफ वापस चल पड़ी। फुलवा का मन नहीं था अजनबी को छोड़ के जाने का ।आखिर उसने पूछ ही लिया उसका नाम ।गोविन्द ये सुनकर वो बहुत खुश हुयी और गोविन्द भी उससे मिलने का वादा करके अपने घर चला गया। अब फुलवा को कहीं चैन नहीं था ।उसे तो हर घडी गोविन्द से मिलने की तड़प थी। उसकी हालत उसकी बहनों से छिपी नहीं थी। वो रोज महुआ को लेकर नदी किनारे जाया करती थी। पर गोविन्द को तो जैसे सुध ही नहीं थी। फुलवा की सहेली की शादी थी । शादी में फुलवा भी गयी।जब वापस घर आ रही थी तो पीछे से किसी ने आवाज दी। आवाज़ सुनकर वो पलती तो सामने एक नौजवान खड़ा था ।फुलवा ने देखा पर कुछ बोली नहीं ।वो नौजवान फुलवा संग ब्याह करना चाहता था पर फुलवा का दिल तो किसी और का कैदी था। उसने नौजवान ने फुलवा से बात करनी चाही पर फुलवा कुछ न बोली और वहां से भाग गयी।वो नौजवान मनोज था जो फुलवा पर फ़िदा हो चला था। अगले दिन तडके वो फुलवा की माँ से मिला और अपनी इच्छा जताई। उसकी माँ को क्या ऐतराज होता ।फुलवा की माँ ने तुरंत हाँ कर दी। और शादी पक्की हो गयी। शादी में अभी समय था पर फुलवा रात दिन जल रही थी ।वो ये शादी नहीं करना चाहती थी। वो अब भी नदी किनारे गोविन्द का इन्तजार किया करती थी। सर्दी आ गयी थी ।हर तरफ कोहरा और ठण्ड का फैलाव था ।नीरा माँ माँ के साथ गयी थी खेतो में महुआ भी साथ थी।घर में फुलवा थी ।उसकी शादी नजदीक आ रही थी। उसकी माँ ने उसे अब खेतो में ले जाना बंद कर दिया था।फुलवा ने घर का काम निबटाया और मटका लेकर अपनी सहेली के साथ चल दी।
नदी किनारे सब औरतें अपने काम में लगी थी पर फुलवा न जाने किस उधेड़बुन में थी। उसकी सहेली ने आवाज लगे घर नहीं चलना है क्या? उसे तो तब पता चला की वो कहाँ है।अब भी शायद वो गोविन्द की यादों से निकल नहीं पायी थी। हलकी धुप और सर्द मौसम उसे सुहावना नहीं लग रहा था। उसकी शादी का दिन आ गया था पर वो खुश नहीं थी। किसी से कह भी तो नहीं सकती थी और अगर कहती भी तो क्या ।जैसे ढूँढती अपने गोविन्द को इतनी बड़ी दुनिया में ।
Tuesday, August 20, 2013
मेरे बाद
मरने के बाद मेरी बात करोगे मेरी सारी बातों को याद करोगे
मिलेंगे नहीं तुम्हे हम फिर अपनी आँखों को आंसुओं से आबाद करोगे
आँखे बंद होंगी हमारी होंठ सिले होंगेऔर सांसें रुकी होंगी तब तुम्हे अहसास होगा हमारे बिना तुम्हारी जिन्दगी कितनी अधूरी होगी
तुम बात करोगे मुझे पर मेरी जुबां खामोश होगी
तुम पूछोगे सवाल मुझसे पर मै निरूतर होउंगी
मैं जिन्दगी से हारी हुई कफ़न में लिपटी रहूंगी
पर आत्मा मेरी सबको देख रही होगी
तुम्हे भी अहसास तो हो जायेगा मुझसे दूर होकर
कि मर मिटी मै तुम्हारे लिए ये जिन्दगी खोकर
सब होंगे वहां एक मेरे सिवा आँखों में आंसू लिए
मै तो चल पडूँगी सबको छोड़ के उस खुद से मिलने के लिए
मेरी लाश को हाथ मत लगाना भूलकर भी तुम
क्योंकि तुम्हारा स्पर्श मुझे मरने पर मुझे महसूस होगा
तड़प जाउंगी मरने के बाद भी वो लम्हा कितना मनहूस होगा
क्योंकि मेरे मरने कि सिर्फ तुम ही वजह ही वजह होगे
और मेरे साथ साथ तुम भी गुनाहगार होगे
Saturday, August 17, 2013
तेरे ग़म की पनाहों में
जब भी जिक्र हुआ तेरा मोहब्बत के अफसानो में
हमारा नाम ही आया है तेरे दीवानों में
तुम तो मोहब्बत करके भूल गए हमे और हम जीते रहे
मरते रहे तेरी ही यादों के मकानों में
दुनिया ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी मुझे इल्जाम देने में
पर फिर भी जी रही हूँ मै उनके तानो में
जिन्दगी ख़तम भी नहीं होती है मेरी कोशिश बहुत कीमैंने
छुटकारा नहीं मिलता तेरे बीते अफसानो से
प्यार का जहर इस कदर भर गया है मुझमे की अब बस
टूट ही जाती हु तेरे नाम के आ जाने से
नशा है ये शराब से बढकर अब समझ आया दिखता
है साफ़ मेरी आँखों के टूटे पैमानों में
मेरी बज़्म में भी तूही है आकर देख ले तू अब यहाँ कयोंकि.
जिक्र तेरा अब भी है मेरे आशियानों में
सुर्ख जो ये आँखे हो गयी इनका सबब जान ले तू आकर
दिल के सूखे रेगिस्तानो में
अब तो घर भी मेरा कब्रिस्तान हो गया क्योंकि आता
नहीं भी है इन वीरानों में
दिल का टूटना कुछ इस कदर कर गया असर मुझ पर
कि उमर ही गुज़रेगी अब मेखानो में
पीना शौक तो न था मेरा पर क्या करूँ मैं आज भी
मेरी रूह भटकती है तेरे ही गलियारों में
रंज मुझे ये नहीं कि तू छुट गया पर कैसे छोड़ दू
खुद को तेरी यादों के शामियानो में
जब भी दिया गम ही दिया उसने और छोड़ दिया मुझे
अकेला इस गम के अंधियारों में
गम का आलम और ये दुनिया क्या समझेगी मुझे रहती
हूं बस अपने गम की पनाहों में
राखी
Wednesday, August 14, 2013
तुम मेरा अतीत
वक़्त बहुत हो गुआ तुझसे मिले पर इन आँखों में तेरी तस्वीर क्यों है
तोड़ दिया जिसने दिल मेरा और यकीं मोहबत से वो आज भी प्यार के काबिल क्यों है
जिसकी यादो को चुन चुन के जीवनसे निकाल दिया मैंने
वो फिर भी मेरी जिन्दगी में शामिल क्यों है
उसकी चाहत रास न आई फिर भी मेरे दिल पर उसका असर क्यों है
ख़तम हो गया है जो मेल उस से पैर आज भी जीवंत उसका प्यार मुझमे क्यों है
वो है भी नहीं मेरे आस पास पर मेरी रगों में दौड़ता उसका इश्क क्यों है
हर सवाल का जवाब है मेरे पास पर उसके सवाल पर मेरी जुबान चुप क्यों है
रखा नहीं उस से कोई रिश्ता मैंने पर उसकी याद में डूबा ये दिल क्यों है
बर्बाद कर गया वो मुझे इस क़दर पर फिर भी उस पर ये रहम क्यों है
क़ैद कर दिया मुझे उसे अपनी यादो में पैर इस कदर टूट कर इश्क क्यों है
राखी
संभावना
शादी के कई साल तक
साथ रहने के बाद भी
बिछड़ना चाहते थे वो
क्योंकि एक सी दिनचर्या
ने नीरसता भर दी थी
उनके संबंधो में
तब वो बहाने खोजने लगे
और एक दुसरे की कमियों को
बढ़ा चढा कर बोलने लगे
धीरे धीरे आई समंधो की खट्टास से
उनका संग रहना असंभव हो चला था
ऐसे में किसी को बिना बताये वे अलग अलग रहने लगे
फिर जब तन्हयिओन में निपट अकेले हो गए
तब उन्हें याद आया कि एक ही घर में रहते हुए
हँस कर मिलना साथ साथ चाय नाश्ता लेना
दिनभर गप्पे हाकना कभी झाड पोछ और
कभी धुले कपडे तह करना शाम की चाय
रात का खाना और टहलते हुए दूर निकल जाना
उसके बाद भी बहुत कुछ एक साथ
नींद के आगोश में जाने तक वे फिर लौट आये
साथ साथ रहने केलिए
घर को फिर सजाया जा रहा है
और साथ में रहना खुद को शिखाया जा रहा है