Friday, August 22, 2014

दिल ने जिसे अपना कहा

काश के खुद अपनी रहमतें मुझ बरसा देता
काश वो तुझे मेरी इस झोली में डाल देता
पर ये हो न सका और तू मेरे लिए गैर बन गया
पर गलती मेरी नहीं आखिर तू ही तो था
दिल ने जिसे पहली नजर देखकर  अपना कहा
खुदा गवाह है कि सोई नहीं मैं उस रात
जिस दिन तुझसे मिली थी
प्यार की कलियाँ तुझे देखके जब फूल बनी थी
कहाँ गया वो मंजर कहाँ गए वो दिन
जब उस खुद ने ये प्रेम कहाँ लिखी थी
रश्क नहीं मुझको तुझसे जुदाई का
बस इतना ही सोचती हूँ की तू ही था वो दिल ने जिसे अपना कहा
जिन्दगी बीत तो रही है मेरी पर
जी नहीं रही मई तेरे बगैर
हर बार सोचती हु बस अब येही
की क्यों तुझे अपना कहा
राखी

Thursday, August 21, 2014

ये मन क्यों उदास होता है

जब भी ये मन उदास होता है
तेरा मेरे पास होने का अहसास होता है
कुछ यादें मानस पटल से कभी धूमिल नहीं होती
और मन को ये आभास बार बार होता है
काश के कोई जाके तुम्हे भी ये बता दे
की तुम्हारा हर पल मुझे इंतज़ार होता है
मैं तो हर पल निहारती हु मन की आँखों से तुम्हे
पर पता नहीं कि तुम्हारा भी मन भी क्या ऐसे खुशग्वार होता है
मदहोश सी रहती हूँ हर पल तुम्हारी यादों की खुशबू से
दिल में हर बार उमंगों का सैलाब होता है
आँखों में कई सपने संजोए हैं मैंने और
हर मेरा हर सपना तेरा ही तलबगार होता है
तुझसे दूर होकर भी दूर नहीं हूँ मैं
पर क्या करू मेरा ये मन जाने क्यूँ फिर भी उदास रहता है
राखी शर्मा

Wednesday, August 20, 2014

गरीब की रोटी

गरीब की रोटी ही तो है जो उससे सब करवाती है
हमेशा भागता रहता है है बस दो जून रोटी के पीछे
जाने कैसे कैसे खेल खिलाती है ये  रोटी
हर बार एक नयी कैद में डलवाती है ये रोटी
हर बार इसके लिए रोता है वो और मिलने पर अहसान जताती है रोटी
कैसी कैसे खेल दिखाती है रोटी
उमंगो को पंख लगाती है ये रोटी
वो मरने तक ही ले जाती है गरीब को
गरीब की रोटी गरीब की रोटी
राखी

बचपन के दिन

वो बचपन के दिन भी क्या कमाल के थे
उन दिनों हम भी बेमिसाल से थे
गलिओं में खेला करते थे
छतों पर कूदा करते थे
अनमनी सी सूरत बना हम
स्कूल को जाया करते थे
संग दोस्तोके अपने हम धूम मचाया करते थे
खेले हमने खेल बहुत लूडो कैरुम गिल्ली डंडे
लंगड़ी टांग और कब्बडी खो खो में खूब लगाये हथकंडे
दादी और नानी जब रातों को किस्से सुनाया करती थी
वो चुपचाप हमको नींद के आगोश में ले जाया करती थी
अब बस यादें हों उस बचपन की
जहाँ कागज़ की क्षति और हवैजहाज़ उड़ाते थे
पतंग को ले छतों पर हम पेंच लड़ाया करते थे
थक कर हम फिर कहीं भी सो जाते थे
पर सुबह हम खुद को बिस्टेर पे ही पाते थे
काश की वो बचपन का मौसम फिर लौट के आ जाए
और हमको वापस उन पलों की सैर करा लाये
राखी शर्मा

मेरा जीवन एक हादसा

मेरा जनम एक हादसा ही तो है
मैं लड़की जो हूँ
बचपन से मुझे त्याग और बलिदान सिखाया जाता है
थी छोटी तब दादी का लाड प्यार भाई के लिए मुझसे ज्यादा
थोड़ी बड़ी हुई तो माँ और पिताजी ने मुझे स्कूल में डाला
जब घर नहीं पहुँचती थी तक सबकी आँखे द्वार पे रहती थी
लेट न हुआ कर आकार मेरी माँ कहती थी
बड़ी हुई तो कालेज जाने लगी
मेरे ब्याह की चिंता  माँ बाप को सताने लगी
मुझे कोई आज़ादी नहीं दी थी अपना वर चुनने की
मगर मेरी ख्वाइश थी पढ़ लिखकर कुछ बन ने की
पर मुझे झोक दिया गया समाज की
रीतियों के कुंड में
कर दिया मेरा ब्याह छोटी सी उम्र में
सोचा मैंने भी शायद येही मेरी नियति है
और शादी के बंधन में बंधना हर लड़की का जरुरी है
पर ये क्या ससुराल जाते ही सारे सपने टूट गए
सबकी बात सुनते सुनते मेरे सपने मुझसे रूठ गए
चुलाह चौका मेरी ही जिम्मेदारी बन गयी थी
और मेरी हर ख़ुशी और की ख़ुशी पर बलि चढ़ गयी थी
बच्चे हुए तो सोचा दोबारा जीवन जी लुंगी मैं
पर उनकी देख रेख करते करते खुद को भूली मैं
अब बुढ़ापे में मेरी और भी मट्टी पालित हो रही है
मेरी बहुएं हर पल मेरी मरने की बात जोह रही हैं
कभी इस बेटे तो कभी उस बेटे के घर घुम रही हूँ
अपनी जिन्दगी से आजकल इस कदर मैं झूझ रही हु
बस बैठकर येही सोचती हूँ  मैं
मेरा जीवन और कुछ नहीं एक हादसा ही तो है।
राखी शर्मा

Sunday, July 27, 2014

मेरी किस्मत

जाने कितनी बार खरीदी और बेची गयी हूँ मैं
इस समाज ने कितनी बार बोली लगाई मेरी
मुझे जिन्दगी जीने का हक नहीं था क्या
मुझे आज़ाद रहने का शौक नहीं था क्या
मेरे माँ बाप क्यों लाये थे मुझे दुनिया में
क्यों फैक दिया मुझे उन्होंने ओस नर्क में
जहाँ रोज़ मेरी जिस्म और रूह को नोच जाता है
मेरी हर चीख को दबाया और ज़ख्म को कुरेदा जाता है
मुझे रखा  जाता है एक सामान की तरह
हाल कर दिया जाता है शमशान की तरह
मैं भी शायद आदि हो जाती हूँ सब सहने की
कोशिश करू भी तो कैसे इन सब से निकलने की
हर तरफ भेडिये मुझे दबोचने को तैयार बैठे है
किस पे करूँ भरोसा सब मेरे तलबगार बैठे हैं
जीना मेरा इतना ही है या मेरी ये नादानी है
मेरे नसीब में दो जून रोटी और सिर्फ पानी है
कर के एक की हवस पूरी अब उसके लिए मैं बेकार हूँ
और फिर से बाज़ार में बिकने को मैं तैयार हूँ।
राखी

Wednesday, July 23, 2014

एक अरमान

जी शिद्दत से तुम मुझे गले लगाते हो
कसम से मेरे अरमानो को पंख मिलते हैं
लगता है कितने जन्मो से बिछड़े हो मुझसे
जिन्दगी को जीने के कितने रंग  मिलते हैं
तुम्हारी वो अनकाही बाते जो लबो पे आती नहीं
क्यों लबों  की ख़ामोशी अब तुम्हारे टूट जाती नहीं
समझ न सकी आज तक तुम्हारी चाहत को मैं
अब तक अनजान हूँ तुम्हारी कई बातों से मैं
तुमको देख भी लूं तो सुकून दिल को हो जाता है
क्या ऐसे भी कभी प्यार  हो जाता है
जब बातें करते हो तुम तुमको निहारती रहती हूँ
तुम्हारी बातों का अर्थ निकालती ही रह जाती हूँ
काश ये मुम्कम्मल मेरा जहाँ तुझसे से हो जाये
ये अधूरी प्यास तेरे साथ से पूरी हो जाये
कुछ बातें होती है जिनका जिस्म से कोई ताल्लूक नहीं
मुझे इस दुनिया की बातों से कोई मतलब नहीं
तुझमे  ही बस्ती है मेरी दुनिया और मेरा जहान
तुझे पाना मेरा बस बन गया एक अरमान ।
राखी