आज कुछ अलग सा ख़्याल ज़हन में आया है
इश्क़ का एक सवाल मन में घर कर आया है
क्यों आखिर बेज़ार होकर इश्क़ में आदमी
शराब को तन्हाईओं का हमसफ़र बनाता है
शराब में डूबकर खुद को अपने ख्यालों को एक
शख्स के लिए इतना कम ज़ोर बनाता है
क्या औरत भी इसी तरह शराब नही पि सकती
क्या इस मय में खोकर वो सब भुला नही सकती
पर औरत शायद इतनी कमज़ोर नही जो टूट जाए
दिल टूट जाए तो क्या मनोबल उसका टूट न पाये
शराब में खोकर आदमी जो खुद को भुला देता है
दिल टूट जाये तो जिंदगी भी कभी कभी मिटा देता है
पर औरत फिर उठ जाती है खुद को जोड़ ने के लिए
फिर से शायद एक बार टूट कर बिखर जाने के लिए ।
अधूरी वो भी होती है तन्हाई में अश्कों से दामन भिगोती है
पर जिंदगी के सफर को वो यूँही बस यूँही जीती है ।
राखी
Monday, April 20, 2015
एक ख़्याल
Saturday, April 18, 2015
तुझसे इश्क़ क्यों न हो
लरज़ जाती हूँ मैं आज भी जब वो मुझे चुपके से देखता है ।
उसकी आँखों की चिलमन की कसम कयामत होती है जब वो आँखे खोलता है ।
उसके कांपते होठ जब मुझे पुकारते है बेबस होकर फिर रुक जाते हैं ।
ज़लज़ला आ जाता है मेरे जिस्म में जब वो अपनी बाहों में घेरता है ।
उसकी वफायें देखो मेरी जानिब वो मुझसे भी कहीं ज्यादा सोचता है
कैसे न हो उस से इश्क़ मुझे जो अपनी जिंदगी को मेरी ख्वाइशों में तोलता है ।
उसपे कुर्बान मेरी सारी जिंदगी है जो खुद से ज्यादा मुझे तवज्जो देता है ।
उसकी हर एक सांस मेरे लिए है वो अपनी सारी क़ायनात मुझमे देखता है।
राखी शर्मा
Monday, April 13, 2015
ये कैसी जिन्दगी
हलचल सी मची है कोई तूफ़ान सा उठा है
जिंदगी ने आज मुझे फिर से छला है
मौत को इतने पास पाकर बस यही सोचा
ऐ जिंदगी तेरे रास्ते भी बस कमाल है
खुद को ढूँढने निकली जब मैं इस जहाँ में
तो सोचा मैंने की सफ़र बेमिसाल है
कोई नहीं है यहां किसी का ये तो बस
दुनिया में उस रब का माया जाल है
सब हराम का है यहाँ कौन कहता है
सब यहां जो मौजूद वो हलाल है
मेरी जानिब कोई नहीं सोचता मेरे रब
तू ही है बस जिसे मेरा ख़याल है ।
राखी शर्मा
Friday, April 10, 2015
मेरा निश्चय
मन की नदी में चल रही है ख्वाइशों की कश्ती
आते हैं भंवर सुख दुःख के कश्ती को भटकाने
रिश्तों के तूफ़ान भी आते हैं मुझे विचलित करने
पर क्या करूँ भटकती नहीं हु फिर भी मैं
मुझे मेरे लक्ष्य का पता है और ये भी कि मुझे
ये छोटे मोटे तूफ़ान मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते
और मैं निरंतर बढ़ती ही जा रही हूँ शिखर की ओर
मुझे नहीं पता की मेरी मंजिल मुझे मिलेगा या नहीं
पर मैं दृढ़ निश्चय करके बैठी हूँ की कोई मुझे
न तो हिला सकता है न ही गिरा सकता है ।
खुद को इतना मजबूत बना डाला है कि किसी
के बुरा भला कहने का मुझ पे कोई असर नहीं
मेरा काम तो ये है की निरंतर प्रगति के पथ पर
आगे ही आगे बढ़ती ही चली ही जाऊँ ।
राखी शर्मा
Saturday, April 4, 2015
गली का कुत्ता
गली का आवारा लगने वाला कुत्ता
रोज़ आता है मेरे गेट पर शाम को
अब तो उसकी आदत में शुमार हो गया है
रोज़ आना मुझे बुलाना रोटी लेना और चले जाना
और फिर वापस आना और मुझे कृतज्ञता से देखना
मेरे चारों तरफ चक्कर लगाना और अपनी ख़ुशी जताना
बड़ा ही विस्मय से भरा दृश्य होता है मेरे लिए
जब वो अपना आभार प्रकट करता है
फिर वो आवारा कैसे हुआ उस से ज्यादा
शिष्ट और कृतज्ञ तो इंसान भी नहीं है
फिर भी दिल में जगह नहीं बहुत लोगो
इन सड़क पर घूमने वाले पशुओं के लिये
क्या ये भी हमारे समाज का अभिन्न अंग नहीं
जिस वो नहीं आता मैं बैचैन सी उसकी रह देखती हूँ
शायद मैं भी जुड़ गयी हूँ उस बेजुबान से जो मुझे
बिना बोले ही सब समझ देता है की क्या चाहता है वो
क्या ये उसकी सभ्यता का परिचायक नहीं की वो घर
के बाहर ही इंतज़ार करता है एक रोटी के लिए
फिर वो आवारा कैसे हुआ ...............
राखी शर्मा
Friday, April 3, 2015
खामोश मोहब्बत
न उसने इकरार किया न मैंने इज़हार किया
न उसने कोई वादा किया न ही मैंने कसम खायी
पर फिर भी एक खामोश सा प्यार है हम दोनों में
न मेरे बिना वो रह सकता है न उसके बिना मैं
और ये खामोश प्यार हमारे जीने की वजह है
उसकी नजरे जाने कैसे मेरी नजरों की भाषा को पढ़ लेती है
और मुझे अपने वश में कर लेती हैं जैसे जादू किया हो
और मैं देखती ही रह जाती हूँ उसे बरबस
अपनी आखो में मासूमियत लेकर मेरा कोई ज़ोर नहीं चलता ।
मुझे इतना बेबस कर देता है की उसके कलावा न कुछ सुनाई देता है न दिखाई
एक वो रहता है नजर के सामने भी और आँखों के दरमियान भी
राखी शर्मा
Monday, January 19, 2015
नारी हूँ न
रोज़ टूट कर मैं फिर जुड़ जाती हूँ
नारी हूँ न अपना फ़र्ज़ निभाती हूँ
दिल के टुकड़े तो होते हैं कई बार मेरे
उन टुकड़ों को जोड़ कर मैं नया दिल बनाती हूँ।
नारी हूँ...........
ये कैसा विरोधाभास है मेरे जीवन का
जीवन को अपने अकारण ही जीती चली जाती हूँ।
कई रूप है मेरे उन सब का भी बोझ ढोती चली जाती हूँ।
अपने मन को मार के सब की खवाइशें पूरी करती चली जाती हूँ।
नारी हूँ..........
मैं अपनी ज़ात की फितरत को हमेशा ही निभाती हूँ
प्रेम भी है मुझे और प्रेमी के लिए बलिदान भी कर जाती हूँ
कोई कायर कहे मुझे तो कहे पर जिम्मेदारियों पर खरी उतर जाती हूँ।
अपनी जिंदगी मैं हमेशा दूसरों के नाम कर जाती हूँ।
नारी हूँ..........
येही विडम्बना है मेरी बस एहि मेरा नसीब है
दूसरों के लिए जिन ही मेरी जिंदगी का उसूल है
अब जब उसी रब ने किया है मेरा फैसला तो फिर
हाँ मैं कहती हूँ की उस रब का दिया हर ज़ुल्म मुझे कबूल है ।
नारी हूँ..........
राखी शर्मा