Saturday, May 2, 2015

उसका असर

रूह में मेरी इस तरह उतर गया वो मेरा चाहनेवाला
कि अब तो मेरा फ़क्त ये बदन रह गया है
ले गया अपने साथ मुझे भी वो जो मेरा रहनुमा नहीं था
अब वो ही एकलौता मेरी यादों का हमसफ़र बन गया है
इस बदन  का तो बस खाका रह गया ऐ मेरे मुंतज़िर
मेरी रूह मेरे ख्याल और ख्वाबो में इस तरह घर कर गया है
अब तो जान बाकी रह गयी है मुझमे एक अमानत उसकी
वर्ना वो तो मेरी धड़कनो को भी अपने मुताबिक़ कर गया है।
राखी शर्मा

Thursday, April 30, 2015

मेरा बयान

इश्क हो गया तो उम्मीद खो गयी
तेरे प्यार की मैं मुरीद हो गयी
न इसकी कोई मंज़िल न कोई ठिकाना
मेरी हालत कुछ गंभीर हो गयी
डूबी हूँ जबसे तेरी आँखो के समंदर में
मैं तो जैसे तेरी हीर हो गयी
बंद पिंजरे में पक्षी की तरह तड़पती हूँ
ऐसी मेरी तासीर हो गयी
दीन दुनिया से बेखबर हो तुझमे खोयी हूँ
मेरी तो रातें रंगीन हो गयी
मसला ऐ मोहब्बत इससे बढ़कर क्या होगा
कि मैं तेरे इश्क़ में फ़क़ीर हो गयी
न मेरा कोई मज़हब रहा न ही कोई ज़ात मौला
मैं शायद पाकीज़ा पीर हो गयी
तवज्जो दे ऐ मेरे हमनवा अब तो तू मुझको
के मैं ज़र्रों में ही कहीं विलीन हो गयी ।
राखी शर्मा

Sunday, April 26, 2015

बता दो न प्रिये


आजकल तुम इतना विरह क्यों लिखती हो प्रिये
तुम मुझको बतला दो आज क्यों होती हो गंभीर प्रिये
चंचल चितवन मेरी प्रिये जाने कहाँ अब खो गयी है
वो तो सबसे कटने लगी और एकाकी हो गयी गई है
रहती थी जो खिली खिली अब मुरझा सी गयी है वो
आखिर ऐसा क्या है जो मुझसे अनजानी सी हुई है वो
कल कल नदियों सी उसकी हंसी अब कहीं खो गयी है
हर पल मुझको अपनी लगती पर अब बेगानी हो गयी है
बता दो न ये राज़ और  खोलो अपने मन के द्वार प्रिये
तुम एक बार मुझको अपना मान कुछ तो बोलो प्राणप्रिये
कुम्हला सी गयी है सूरत तुम्हारी जो फूलों सी खिलती थी
मुझसे मिलने तो तुम जाने क्या जतन करने लगती थी
अब तो सामने भी आ जाऊं तो तुम मुस्काती नहीं हो
अपनी आँखों की पलके मेरी पलकों से मिलाती नही हो
क्यों आखिर तुम इतना आजकल संजीदा हो गयी हो
क्यों मेरे सामने होते हुए भी और कहीं खो गयी हो
जिस चहरे पे हमेशा लालिमा झलकी वो क्यों हुआ पीला
शबनमी गुलाबी होंटों का रंग भी अब तो हो गया नीला
क्या मैं हूँ इन सब का जिम्मेदार और गुनाहगार प्रिये
उस रब ही खातिर ही छोड़ दो मुख से शब्दबाण प्रिये ।
राखी शर्मा

Monday, April 20, 2015

एक ख़्याल

आज कुछ अलग सा ख़्याल ज़हन में आया है
इश्क़ का एक सवाल मन में घर कर आया है
क्यों आखिर बेज़ार होकर इश्क़ में आदमी
शराब को तन्हाईओं का हमसफ़र बनाता है
शराब में डूबकर खुद को अपने ख्यालों को एक
शख्स के लिए इतना कम ज़ोर बनाता है
क्या औरत भी इसी तरह शराब नही पि सकती
क्या इस मय में खोकर वो सब भुला नही सकती
पर औरत शायद इतनी कमज़ोर नही जो टूट जाए
दिल टूट जाए तो क्या मनोबल उसका टूट न पाये
शराब में खोकर आदमी जो खुद को भुला देता है
दिल टूट जाये तो जिंदगी भी कभी कभी मिटा देता है
पर औरत फिर उठ जाती है खुद को जोड़ ने के लिए
फिर से शायद एक बार टूट कर बिखर जाने के लिए ।
अधूरी वो भी होती है तन्हाई में अश्कों से दामन भिगोती है
पर जिंदगी के सफर को वो यूँही बस यूँही जीती है ।
राखी

Saturday, April 18, 2015

तुझसे इश्क़ क्यों न हो

लरज़ जाती हूँ मैं आज भी जब वो मुझे चुपके से देखता है ।
उसकी आँखों की चिलमन की कसम कयामत होती है जब वो आँखे खोलता है ।
उसके कांपते होठ जब मुझे पुकारते है बेबस होकर फिर रुक जाते हैं ।
ज़लज़ला आ जाता है मेरे जिस्म में जब वो अपनी बाहों में घेरता है ।
उसकी वफायें देखो मेरी जानिब वो मुझसे भी कहीं ज्यादा सोचता है
कैसे न हो उस से इश्क़ मुझे जो अपनी जिंदगी को मेरी ख्वाइशों में तोलता है ।
उसपे कुर्बान मेरी सारी जिंदगी है जो खुद से ज्यादा मुझे तवज्जो देता है ।
उसकी हर एक सांस मेरे लिए है वो अपनी सारी क़ायनात मुझमे देखता है।
राखी शर्मा

Monday, April 13, 2015

ये कैसी जिन्दगी

हलचल सी मची है कोई तूफ़ान सा उठा है
जिंदगी ने आज मुझे फिर से छला है
मौत को इतने पास पाकर बस यही सोचा
ऐ जिंदगी तेरे रास्ते भी बस कमाल है
खुद को ढूँढने निकली जब मैं इस जहाँ में
तो सोचा मैंने की सफ़र बेमिसाल है
कोई नहीं है यहां किसी का ये तो बस
दुनिया में उस रब का माया जाल है
सब हराम का है यहाँ कौन कहता है
सब यहां जो मौजूद वो हलाल है
मेरी जानिब कोई नहीं सोचता मेरे रब
तू ही है बस जिसे मेरा ख़याल है ।
राखी शर्मा

Friday, April 10, 2015

मेरा निश्चय


मन की नदी में चल रही है ख्वाइशों की कश्ती
आते हैं भंवर सुख दुःख के कश्ती को भटकाने
रिश्तों के तूफ़ान भी आते हैं मुझे विचलित करने
पर क्या करूँ भटकती नहीं हु फिर भी मैं
मुझे मेरे लक्ष्य का पता है और ये भी कि मुझे
ये छोटे मोटे तूफ़ान मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते
और मैं निरंतर बढ़ती ही जा रही हूँ शिखर की ओर
मुझे नहीं पता की मेरी मंजिल मुझे मिलेगा या नहीं
पर मैं दृढ़ निश्चय करके बैठी हूँ की कोई मुझे
न तो हिला सकता है न ही गिरा सकता है ।
खुद को इतना मजबूत बना डाला है कि किसी
के बुरा भला कहने का मुझ पे कोई असर नहीं
मेरा काम तो ये है की निरंतर प्रगति के पथ पर
आगे ही आगे बढ़ती ही चली ही जाऊँ ।
राखी शर्मा